चंडीगढ़: चंडीगढ़ के होटल द ललित में आज तकनीक और पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जहाँ इंडियन सोसाइटी ऑफ हीटिंग, रेफ्रिजरेटिंग एंड एयर कंडीशनिंग इंजीनियर्स (इशरे) के चंडीगढ़ चैप्टर द्वारा प्रमुख सम्मेलन “ऊर्जावरण” का सफल आयोजन किया गया। “एनर्जी कंजरवेशन एंड डिकार्बोनाइजेशन” के विषय पर केंद्रित इस कार्यक्रम में देशभर से आए नीति-निर्माताओं और इंजीनियरों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को यदि भविष्य की चुनौतियों से लड़ना है, तो भवनों के निर्माण और ऊर्जा खपत के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे।
डिकार्बोनाइजेशन: समय की पुकार और उद्योग की भूमिका
सम्मेलन का आगाज करते हुए ऊर्जावरण के संयोजक अनंत सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और स्पष्ट किया कि डिकार्बोनाइजेशन अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने रेखांकित किया कि एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन उद्योग, जो वर्तमान में ऊर्जा की भारी खपत के लिए जाना जाता है, वही कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने टिकाऊ और कम-कार्बन वाले बुनियादी ढांचे के निर्माण की शपथ ली।
नीति और तकनीक का रणनीतिक गठजोड़
सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए इशरे चंडीगढ़ चैप्टर के प्रेसिडेंट-इलेक्ट रोहित राज ने उन्नत ऊर्जा-कुशल तकनीकों को अपनाने की वकालत की। वहीं, पीईडीए (PEDA) की मैनेजर मनी खन्ना ने चौंकाने वाले आंकड़े साझा करते हुए बताया कि वैश्विक स्तर पर भवन निर्माण क्षेत्र लगभग 40 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि अब केवल ऊर्जा बचाना काफी नहीं है, बल्कि पूरे भवन क्षेत्र को पूरी तरह से डिकार्बोनाइज करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का समय आ गया है।
भविष्य की तकनीक: एआई और पैसिव कूलिंग पर मंथन
तकनीकी सत्रों के दौरान जियोथर्मल, हाइब्रिड कूलिंग सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक विषयों पर गहन चर्चा हुई। विशेष रूप से “इंडियन बिल्ट एनवायरनमेंट में एआई” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा ने सभी का ध्यान खींचा, जिसमें आशीष राखेजा, आशु गुप्ता और पूर्व आईएएस अधिकारी विवेक अत्रे जैसे दिग्गजों ने अपने विचार रखे। विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि एआई के माध्यम से भवन प्रबंधन को अधिक स्मार्ट और ऊर्जा-कुशल बनाया जा सकता है, जो भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा।
संपादकीय टिप्पणी: ‘ऊर्जावरण’ जैसे सम्मेलन यह सिद्ध करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई अब केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी धरातल पर लड़ी जा रही है। निर्माण क्षेत्र द्वारा होने वाला 40 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन एक गंभीर चुनौती है, जिसे कम करने के लिए ‘इशरे’ जैसे संगठनों का प्रयास सराहनीय है। एआई और पैसिव कूलिंग जैसी तकनीकों का समावेश न केवल बिजली के बिलों को कम करेगा, बल्कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने में भी मदद करेगा। आवश्यकता इस बात की है कि इन तकनीकी चर्चाओं को केवल होटलों के कमरों तक सीमित न रखकर सरकारी नीतियों और जमीनी स्तर के निर्माण कार्यों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
