नकोदर: दीपावली, जिसे हम आमतौर पर रोशनी, खुशियों और समृद्धि का त्योहार मानते हैं, अक्सर दीये जलाने, देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने और उपहारों के आदान-प्रदान तक ही सीमित रह जाता है। लेकिन क्या वास्तव में इस पर्व का अर्थ केवल बाहरी चकाचौंध और आतिशबाजी तक सिमट गया है? क्या वह त्योहार जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, आज प्रदूषण और दिखावे का शिकार नहीं हो गया है? इन अहम सवालों को उठाते हुए भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य मुनीष धीर ने दीपावली के धार्मिक, ऐतिहासिक और सबसे बढ़कर, इसके गहरे आध्यात्मिक महत्व पर विचार करने का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अज्ञानता पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का एक सशक्त प्रतीक है।
मिट्टी का दीया और आत्मा की ज्योति
मुनीष धीर ने दीपावली के वास्तविक संदेश की गहराई में जाते हुए बताया कि यह केवल मिट्टी के दीपक जलाने, नए वस्त्र पहनने या मिठाइयाँ बांटने का पर्व नहीं है। उन्होंने शरीर की तुलना एक मिट्टी के दीये से की और उसके भीतर मौजूद आत्मा को एक दिव्य ज्योति बताया। उनका मानना है कि जब यह आत्मा रूपी दीपक परमात्मा के ज्ञान और राजयोग के माध्यम से जागृत होता है, तो मनुष्य के जीवन से क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या जैसा गहन अंधकार अपने आप ही मिट जाता है।
सच्ची सफाई: मन के कोनों को चमकाना
दीपावली के अवसर पर घरों की सफाई करने की परंपरा का उल्लेख करते हुए धीर ने एक बहुत ही प्रासंगिक तुलना की। उन्होंने कहा कि जिस तरह हम अपने घरों के कोने-कोने को साफ करते हैं, उसी तरह हमें अपने मन के कोनों की भी सफाई करनी चाहिए। पुरानी नकारात्मक बातों, गलतफहमियों और कटुता को अपने मन से पूरी तरह निकालकर सभी के प्रति शुभ भावनाएं रखना ही वास्तव में सच्ची सफाई है।
सच्ची लक्ष्मी का आगमन
मुनीष धीर ने बताया कि जब हमारा मन पूरी तरह से पवित्र और स्वच्छ होता है, तभी हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और दैवीय गुणों के रूप में सच्ची लक्ष्मी का आगमन होता है। उन्होंने दीपावली पर नए बही-खाते शुरू करने की परंपरा का भी एक आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने पुराने, नकारात्मक संस्कारों को विदाई देकर, परमात्मा की स्मृति के साथ एक नए और श्रेष्ठ जीवन की शुरुआत करनी चाहिए।
सबसे अमूल्य उपहार: सम्मान और स्वीकार्यता
अपने संदेश के अंत में, मुनीष धीर ने सभी से एक मार्मिक अपील की। उन्होंने कहा कि इस दीपावली पर एक-दूसरे को केवल भौतिक उपहार देने के बजाय, सम्मान और स्वीकार्यता का सबसे अमूल्य उपहार देना चाहिए। उनका आह्वान था कि हम सब मिलकर अपने भीतर ज्ञान का दीप जलाएं और इस पूरे संसार को सुख और शांति की रोशनी से जगमगा दें।
संपादकीय टिप्पणी: दीपावली का त्योहार आज के समय में अक्सर अपनी बाहरी चमक-दमक में अपना वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ खोता हुआ प्रतीत होता है। मुनीष धीर का यह संदेश एक महत्वपूर्ण रिमाइंडर है कि यह पर्व मूलतः आंतरिक प्रकाश और आत्म-जागरूकता का उत्सव है। केवल बाहरी दीये जलाने से हम उस अंधकार को दूर नहीं कर सकते जो हमारे भीतर क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार के रूप में मौजूद है। सच्ची दीपावली वही है जब हम अपने विचारों में सकारात्मकता लाएं और समाज में करुणा और सम्मान का प्रकाश फैलाएं।
www.feedfront.in
असली दीवाली: जब मन का अंधेरा मिटेगा, तब ज्ञान का दीपक जलेगा!
✍️ By: Harsh Gogi
👁️ 29K Views till today 11:01 AM
नकोदर: दीपावली, जिसे हम आमतौर पर रोशनी, खुशियों और समृद्धि का त्योहार मानते हैं, अक्सर दीये जलाने, देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने और उपहारों के आदान-प्रदान तक ही सीमित रह जाता है। लेकिन क्या वास्तव में इस पर्व का अर्थ केवल बाहरी चकाचौंध और आतिशबाजी तक सिमट गया है? क्या वह त्योहार जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, आज प्रदूषण और दिखावे का शिकार नहीं हो गया है? इन अहम सवालों को उठाते हुए भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य मुनीष धीर ने दीपावली के धार्मिक, ऐतिहासिक और सबसे बढ़कर, इसके गहरे आध्यात्मिक महत्व पर विचार करने का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अज्ञानता पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का एक सशक्त प्रतीक है।
मुनीष धीर ने दीपावली के वास्तविक संदेश की गहराई में जाते हुए बताया कि यह केवल मिट्टी के दीपक जलाने, नए वस्त्र पहनने या मिठाइयाँ बांटने का पर्व नहीं है। उन्होंने शरीर की तुलना एक मिट्टी के दीये से की और उसके भीतर मौजूद आत्मा को एक दिव्य ज्योति बताया। उनका मानना है कि जब यह आत्मा रूपी दीपक परमात्मा के ज्ञान और राजयोग के माध्यम से जागृत होता है, तो मनुष्य के जीवन से क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या जैसा गहन अंधकार अपने आप ही मिट जाता है।
दीपावली के अवसर पर घरों की सफाई करने की परंपरा का उल्लेख करते हुए धीर ने एक बहुत ही प्रासंगिक तुलना की। उन्होंने कहा कि जिस तरह हम अपने घरों के कोने-कोने को साफ करते हैं, उसी तरह हमें अपने मन के कोनों की भी सफाई करनी चाहिए। पुरानी नकारात्मक बातों, गलतफहमियों और कटुता को अपने मन से पूरी तरह निकालकर सभी के प्रति शुभ भावनाएं रखना ही वास्तव में सच्ची सफाई है।
मुनीष धीर ने बताया कि जब हमारा मन पूरी तरह से पवित्र और स्वच्छ होता है, तभी हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और दैवीय गुणों के रूप में सच्ची लक्ष्मी का आगमन होता है। उन्होंने दीपावली पर नए बही-खाते शुरू करने की परंपरा का भी एक आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने पुराने, नकारात्मक संस्कारों को विदाई देकर, परमात्मा की स्मृति के साथ एक नए और श्रेष्ठ जीवन की शुरुआत करनी चाहिए।
अपने संदेश के अंत में, मुनीष धीर ने सभी से एक मार्मिक अपील की। उन्होंने कहा कि इस दीपावली पर एक-दूसरे को केवल भौतिक उपहार देने के बजाय, सम्मान और स्वीकार्यता का सबसे अमूल्य उपहार देना चाहिए। उनका आह्वान था कि हम सब मिलकर अपने भीतर ज्ञान का दीप जलाएं और इस पूरे संसार को सुख और शांति की रोशनी से जगमगा दें।
संपादकीय टिप्पणी: दीपावली का त्योहार आज के समय में अक्सर अपनी बाहरी चमक-दमक में अपना वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ खोता हुआ प्रतीत होता है। मुनीष धीर का यह संदेश एक महत्वपूर्ण रिमाइंडर है कि यह पर्व मूलतः आंतरिक प्रकाश और आत्म-जागरूकता का उत्सव है। केवल बाहरी दीये जलाने से हम उस अंधकार को दूर नहीं कर सकते जो हमारे भीतर क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार के रूप में मौजूद है। सच्ची दीपावली वही है जब हम अपने विचारों में सकारात्मकता लाएं और समाज में करुणा और सम्मान का प्रकाश फैलाएं।

