चंडीगढ़: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आखिरकार सालों से चला आ रहा अपना विश्व कप जीतने का सपना 2025 में साकार कर लिया। जैसे ही आखिरी खिलाड़ी आउट हुआ, पूरा स्टेडियम आतिशबाजी और जयकारों से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक जीत ने देश को 1983 और 2011 के पुरुष क्रिकेट विश्व कप की सुनहरी यादें ताजा करवा दीं। पूरे विश्व में दिवाली जैसा उत्सव मनाया जाने लगा, जहां क्रिकेट के दीवाने ढोल की थाप पर झूम उठे और हर तरफ बधाई संदेशों का आदान-प्रदान शुरू हो गया।
चंडीगढ़ के जश्न पर गंभीर सवाल
जहां पूरे देश में जश्न का माहौल था, वहीं चंडीगढ़ के जश्न ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। शहर के सबसे प्रमुख जश्न स्थल ‘अरोमा लाइट्स’ पर हमारा ध्यान गया। अक्सर जब भारतीय पुरुष टीम विश्व कप जीतती है, तो इस चौराहे पर पैर रखने तक की जगह नहीं होती। इंडिया के झंडे लहराते हैं और लोग रात भर खुशी से झूमते हैं। मगर, जब हमारी ‘शेरनियों’ ने विश्व कप जीता, तो रात 1 बजे के करीब हमारे पत्रकार द्वारा की गई कवरेज में यह चौक पूरी तरह से शांत और उदास दिखा। वहां गिनती के केवल चार-पांच लोग ही हाथों में झंडे लेकर अपनी खुशी मना रहे थे।
हमारे पत्रकार ने मायूस होकर जश्न मना रहे लोगों से पूछा तो उनका जवाब था कि, “लगता है चंडीगढ़ के लोग बेटियों को ज्यादा अहमियत नहीं देते होंगे।” एक उबर टैक्सी चालक ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि, “हमें अपनी बेटियों पर गर्व है, लेकिन इस अरोमा चौक पर पसरा यह सन्नाटा देखकर मन उदास है।”
भारतीय महिला टीम ने दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हराकर यह पहला आईसीसी वनडे विश्व कप खिताब जीता है। हरमनप्रीत कौर की कप्तानी में मिली यह जीत भारतीय क्रिकेट के इतिहास में मील का पत्थर है। दीप्ति शर्मा ने फाइनल में 58 रन बनाने के अलावा 5 विकेट लेकर ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ का खिताब जीता। यह घटना दर्शाती है कि देश भले ही महिला सशक्तिकरण की बात करता हो, लेकिन बेटियों की ऐतिहासिक उपलब्धि को भी लड़कों की जीत जितनी प्राथमिकता देने के मामले में हम अभी भी पीछे हैं।
