झिड़ी (जम्मू): सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर पूर्णिमा के दिन, जम्मू के झिड़ी में हर साल की तरह इस बार भी बाबा जीतमल और बुआ दाती का विशाल मेला आयोजित किया गया। इस ऐतिहासिक धार्मिक समागम में पंजाब, हरियाणा, और दिल्ली सहित कई राज्यों से लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और ‘जय बुआ दाती की’, ‘जय बुआ बाबा की’ के जयकारे लगाए।
बाबा जीतमल की तपस्या और वरदान
मंदिर के पंडित जी ने इस पवित्र स्थान से जुड़ी मान्यताओं और ऐतिहासिक कहानी पर प्रकाश डाला।
- तपस्या की शुरुआत: मान्यतानुसार, बाबा जीतमल पहले खेती का काम करते थे। अपनी चाची के कठोर व्यवहार से दुखी होकर, वह घर छोड़कर माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने एक महात्मा को भक्ति में लीन देखा और स्वयं भी वहीं बैठकर मां वैष्णो देवी की आराधना में लीन हो गए।
- मां वैष्णो देवी के दर्शन: महात्मा ने जब बालक जीतमल को दर्शन की इच्छा रखते देखा तो हँसकर कहा कि उन्हें वर्षों की तपस्या के बाद भी दर्शन नहीं हुए, तो बालक को कैसे होंगे? लेकिन बाबा जीतमल की अथाह भक्ति से प्रसन्न होकर, मां वैष्णो देवी ने साक्षात् उन्हें दर्शन दिए।
- बंजर भूमि का चमत्कार: गांव लौटने पर बाबा जीतमल ने राजा से थोड़ी ज़मीन मांगी। राजा ने उन्हें एक बंजर ज़मीन दे दी। बाबा जी ने कठोर परिश्रम से उस ज़मीन को उपजाऊ बनाया। जब पानी की कमी हुई तो बाबा जी ने मां वैष्णो देवी से फ़रियाद की, और मां ने वहाँ ‘वांग गंगा’ (जलधारा) चला दी।
राजा का लालच और मां का क्रोध
जब खेत में भरपूर फ़सल हुई, तो राजा के मन में लालच आ गया और उसने चोरी से गेहूँ लेने की कोशिश की। इससे मां वैष्णो देवी को गुस्सा आया, और देखते ही देखते तेज़ तूफ़ान और बारिश शुरू हो गई। तूफ़ान के कारण गेहूँ उड़कर दूर-दूर तक फैल गया। पंडित जी के अनुसार, मां ने तभी बाबा जीतमल को वरदान दिया कि जहाँ-जहाँ यह गेहूँ उड़कर गया है, वहाँ-वहाँ से श्रद्धालु आपके यहाँ हाज़िरी भरने आएँगे। पंडित जी ने अंत में यह भी बताया कि इस मंदिर में जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य पूर्ण होती है।
