तौंगां: तौंगां गांव के बाहर का आसमान आज अचानक स्याह हो गया। हवाओं में घुली रबर और पॉलिथीन की कड़वाहट ने ग्रामीणों का दम घोंटना शुरू कर दिया। जिस जमीन को किसानों ने मोटे किराए के लालच में कबाड़ कारोबारियों को सौंपा था, वही जमीन आज आग की लपटों और जहरीले धुएं का केंद्र बन गई। गमाडा (GMADA) के सख्त आदेशों के बाद दुकानदार अपना कीमती सामान तो समेट ले गए, लेकिन पीछे छोड़ गए वो कचरा जो आज पूरे इलाके के लिए मुसीबत का सबब बन गया। दोपहर के वक्त कुछ कूड़ा बीनने वालों की एक लापरवाही ने इस शांत गांव को अराजकता के धुएं में धकेल दिया।
राख के ढेर में सुलगती साजिश
गमाडा की कार्रवाई के बाद दुकानें बंद हो चुकी थीं, लेकिन जमीन पर बिछा पॉलिथीन और रबर का अंबार किसी बड़े खतरे की दस्तक दे रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोपहर बाद कुछ अज्ञात कूड़ा बीनने वाले लोग वहां पहुंचे और कबाड़ में आग लगाकर रफूचक्कर हो गए। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। ग्रामीणों ने कुछ पुरुषों और महिलाओं को घटनास्थल से भागते हुए भी देखा, जिसके बाद गांव में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सरपंच की जद्दोजहद और धधकती लपटें
घटना की सूचना मिलते ही तौंगां के सरपंच रवि राणा बिना समय गंवाए मौके पर पहुंचे। उन्होंने तुरंत पुलिस और दमकल विभाग को इस तबाही की जानकारी दी। हवा की तेज रफ्तार ने आग में घी का काम किया, जिससे लपटें तेजी से फैलने लगीं। सरपंच राणा ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं है; इससे पहले भी दो-तीन बार यहां आग लग चुकी है। धुएं का काला गुबार इतना घना था कि आसमान दिखाई देना बंद हो गया और टीन के बने अस्थाई कमरे आग की भट्टी में तब्दील होकर दहकने लगे।
दोहरे मापदंडों पर व्यवस्था का घेराव
दमकल विभाग की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन सरपंच रवि राणा के चेहरे पर व्यवस्था के प्रति गहरा रोष दिखाई दिया। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग को बार-बार सूचित करने के बावजूद किसी ने फोन तक उठाना मुनासिब नहीं समझा। राणा का तर्क था कि यदि कोई किसान खेत में पराली जला दे, तो प्रशासन तुरंत चालान काटने पहुंच जाता है, लेकिन कबाड़ माफिया द्वारा फैलाए गए इस घातक प्रदूषण पर अधिकारी मौन साधे हुए हैं।
संपादकीय टिप्पणी: > तौंगां गांव की यह घटना प्रशासनिक लापरवाही और निजी लालच के घातक मेल को उजागर करती है। गमाडा द्वारा दुकानें बंद कराने के बावजूद वहां भारी मात्रा में ज्वलनशील और जहरीला कचरा छोड़ देना जमीन मालिकों और प्रशासन की विफलता है। सबसे गंभीर सवाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर उठता है, जो अक्सर छोटे किसानों पर तो सख्ती दिखाता है, लेकिन कबाड़ माफिया द्वारा फैलाए जा रहे इस पर्यावरणीय खतरे के प्रति उदासीन बना रहता है। जब तक नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित रहेगा, तब तक आम नागरिक इसी तरह जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर रहेंगे।
