नकोदर: पंजाब भर में सरकारी सेवाएं हासिल करने की उम्मीद लेकर सेवा केंद्रों के दरवाजे पर पहुंच रहे आम नागरिकों को प्रशासनिक उदासीनता और तकनीकी खामियों का दंश झेलना पड़ रहा है। डिजिटल गवर्नेंस के बड़े-बड़े दावे करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार के राज में अब सेवा केंद्र वास्तव में जनता के लिए सजा केंद्र में तब्दील हो चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी जालंधर देहाती के जिला अध्यक्ष मुनीश धीर ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए सूबे के इस गंभीर प्रशासनिक संकट को सार्वजनिक किया है और बताया है कि किस तरह कर्मचारियों की हड़ताल और तकनीकी पोर्टल के बंद होने के कारण पूरी व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है।
भीषण गर्मी और लंबी कतारों का संताप
पंजाब सरकार का ‘कनेक्ट पंजाब पोर्टल’ बार-बार ठप होने के कारण सेवा केंद्रों के भीतर चलने वाली जन सेवाएं पूरी तरह बंद हो चुकी हैं। इस प्रशासनिक विफलता के कारण भीषण गर्मी के मौसम में बुजुर्ग, महिलाएं, विद्यार्थी, किसान और रोजाना दिहाड़ी करके अपना पेट भरने वाले मजदूर सुबह से ही लंबी कतारों में खड़े होने के लिए मजबूर हैं। जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और आधार कार्ड जैसे अति आवश्यक दस्तावेजों का काम पूरी तरह ठप पड़ा है, जिसके कारण लोगों को घंटों इंतजार करने के बाद सिर्फ पोर्टल बंद होने का बहाना सुनाकर खाली हाथ वापस लौटा दिया जाता है।
जनता की जेब पर मार और सुशासन का सच
यह स्थिति न केवल आम लोगों के कीमती समय को बर्बाद कर रही है, बल्कि उनकी आर्थिक लूट का कारण भी बन रही है। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से अपनी दिहाड़ी छोड़कर और किराया खर्च करके आने वाले गरीब लोगों को सरकार की लापरवाही के कारण मानसिक और वित्तीय मार झेलनी पड़ रही है। भाजपा नेता मुनीश धीर ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि जो सरकार अपना एक डिजिटल पोर्टल सुचारू रूप से नहीं चला सकती, उसे सुशासन और पारदर्शी गवर्नेंस के दावे करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने मांग की है कि कनेक्ट पंजाब पोर्टल की तकनीकी खामियों को युद्धस्तर पर दूर किया जाए और जब तक यह बहाल नहीं होता, तब तक वैकल्पिक ऑफलाइन व्यवस्था शुरू की जाए ताकि लोगों के जरूरी कार्य प्रभावित न हों। इसके साथ ही इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि सरकारी सेवाएं हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं, सरकार की कृपा नहीं।
संपादकीय टिप्पणी: सेवा केंद्रों की मौजूदा तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि जब तक डिजिटल बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं होता, तब तक डिजिटल गवर्नेंस के नारे जमीनी स्तर पर खोखले साबित होते हैं। कर्मचारियों की हड़ताल और पोर्टल का बार-बार बंद होना न केवल प्रशासनिक तालमेल की कमी को दर्शाता है, बल्कि आम नागरिकों के मूल अधिकारों को भी प्रभावित करता है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करके न केवल तकनीकी ढांचे को दुरुस्त करना चाहिए, बल्कि ऐसे संकट के समय वैकल्पिक ऑफलाइन प्रबंध हमेशा तैयार रखने चाहिए ताकि जनता को ऐसी असहनीय खज्जल-ख्वारी से बचाया जा सके और सुशासन के दावों की सार्थकता बनी रहे।
