चंडीगढ़: चंडीगढ़ के रायपुर कलां स्थित गौशाला का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। गायों की सामूहिक मृत्यु और घायल अवस्था में मिलने के बाद उपजा आक्रोश अब विभाग की आंतरिक राजनीति और भ्रष्टाचार की ओर मुड़ गया है। ताजा घटनाक्रम में, मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ (MOH) विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं, जहाँ एक छोटे कर्मचारी को ‘बली का बकरा’ बनाकर असली दोषियों को बचाने के आरोप लग रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
रायपुर कलां गौशाला में बड़ी संख्या में गायों की मौत और बदहाली की खबर मिलते ही धार्मिक संस्थाओं और समाजसेवी संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया था। जब हंगामा बढ़ा, तो सेक्टर-17 स्थित MOH कार्यालय की अधिकारी डॉ. इंद्रप्रीत कौर ने अपने कर्मचारी रामलाल सिंह को घटनास्थल पर जानकारी जुटाने के लिए भेजा। रामलाल ने दिनभर अधिकारी के साथ रहकर स्थिति का जायजा लिया, लेकिन शाम होते-होते उसे ही सस्पेंशन (निलंबन) का ऑर्डर थमा दिया गया।
रामलाल सिंह का पक्ष: “कागजों में ट्रांसफर, हकीकत में डॉग सेल”
पीड़ित रामलाल सिंह ने विभाग की पोल खोलते हुए बताया कि उनकी ड्यूटी डॉग सेल में थी, न कि गौशाला (कैटल जोन) में। रामलाल ने विभाग पर गंभीर आरोप लगाए:
- फर्जी ट्रांसफर ऑर्डर: रामलाल का दावा है कि विभाग अपनी सुविधानुसार कागजों में किसी का भी ट्रांसफर दिखा देता है। 14 अगस्त 2025 और उसके बाद के कई आदेश तकनीकी रूप से गलत हैं।
- बदलाखोर कार्रवाई: 13 जनवरी को हंगामा हुआ और 14 जनवरी को अचानक उन्हें ट्रांसफर और निलंबन की सूचना दी गई।
- पक्षपात का आरोप: रामलाल के अनुसार, उनके जैसे ही दूसरे कर्मचारी हिम्मत सिंह के ऑर्डर भी गलत तरीके से (इंसिरेटर प्लांट में) दिखाए गए हैं, जिन्हें हिम्मत सिंह ने कभी देखा तक नहीं। सवाल यह है कि रामलाल की नौकरी क्यों छीनी गई जबकि जिम्मेदार अधिकारी अभी भी पदों पर बने हुए हैं।
समाजसेवी संगठनों में रोष
गौशाला की हालत देखकर कई संस्थाओं ने इसकी देखरेख अपने हाथों में लेने के लिए विभाग को प्रस्ताव दिया था। लेकिन विभाग ने सुधार के बजाय एक कांट्रैक्ट कर्मचारी की रोटी छीनने को प्राथमिकता दी। सूत्रों के अनुसार, असली दोषियों को बचाने के लिए फाइलों में बैक-डेट एंट्री और गलत ट्रांसफर पोस्टिंग का खेल खेला गया है।
संपादकीय दृष्टिकोण: रायपुर कलां का यह मामला केवल गायों की मौत का नहीं, बल्कि चंडीगढ़ प्रशासन की प्रशासनिक पारदर्शिता का भी है। एक कांट्रैक्ट कर्मचारी, जो विभाग के आदेश पर वहां जानकारी जुटाने गया, उसे सस्पेंड कर देना न्याय की हत्या है। चंडीगढ़ प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए और यह सुनिश्चित करे कि रामलाल सिंह जैसे बेकसूर को इंसाफ मिले और गौशाला की बदहाली के असली जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनन कार्रवाई हो।

