चंडीगढ़: पंजाब में अभिव्यक्ति की आजादी और सत्ता से सवाल पूछने की लोकतांत्रिक परंपरा आज एक बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के सरकारी हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों और सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज FIR ने राज्य के मीडिया जगत में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। इसी कड़ी में आज पंजाब भर के सैकड़ों पत्रकारों ने चंडीगढ़ की सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ ‘हुंकार’ भरी और अपनी कलम की ताकत का प्रदर्शन किया।
हेलीकॉप्टर विवाद: एक सवाल और पुलिस का ‘प्रहार’
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब पत्रकार मनिंदरजीत सिंह सिद्धू और आरटीआई कार्यकर्ता माणिक गोयल ने मुख्यमंत्री की विदेश यात्रा के दौरान पंजाब सरकार के हेलीकॉप्टर के उपयोग पर सार्वजनिक रूप से सवाल पूछा। उन्होंने पूछा था कि जब मुख्यमंत्री राज्य में मौजूद नहीं हैं, तो सरकारी हेलीकॉप्टर आखिर कौन इस्तेमाल कर रहा है?
इस जायज लोकतांत्रिक सवाल का जवाब देने के बजाय, लुधियाना और बठिंडा पुलिस ने इसे “भ्रामक और फर्जी नैरेटिव” करार देते हुए साइबर क्राइम के तहत FIR दर्ज कर दी। हालांकि सरकार का पक्ष है कि हेलीकॉप्टर का उपयोग एक ‘संवैधानिक पद’ पर आसीन अधिकारी (कथित तौर पर राज्यपाल) द्वारा विधिवत अनुमति के साथ किया गया था, लेकिन पत्रकारों पर सीधे आपराधिक मुकदमे दर्ज करना ‘मीडिया की आवाज को दबाने’ के रूप में देखा जा रहा है।
संसद में ‘पांचवां स्तंभ’ कहने वाले अब ‘दमन’ पर उतारू?
विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के उस पुराने बयान की याद दिलाई, जो उन्होंने बतौर सांसद पार्लियामेंट में दिया था। तब उन्होंने मीडिया को लोकतंत्र का ‘पांचवां स्तंभ’ (अक्सर चौथा स्तंभ कहा जाता है) बताते हुए इसकी आजादी की वकालत की थी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आज सत्ता में आने के बाद वही भगवंत मान सवालों से डर रहे हैं।
चंडीगढ़ प्रेस क्लब का मिला साथ: बैनरों से गूंजा विरोध
चंडीगढ़ प्रेस क्लब ने इस लड़ाई में पंजाब के पत्रकारों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के हाथों में तल्ख संदेशों वाले बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था:
- “कलम की आवाज को दबाना बंद करो।”
- “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ न ढाहो, सच लिखने वालों पर जुल्म न ढाहो।”
- “अनुच्छेद 19(1): हर नागरिक को बोलने और सवाल पूछने का अधिकार है, झूठे पर्चे रद्द करो।”
पत्रकार संगठनों का स्पष्ट मत है कि यदि सरकार को रिपोर्टिंग के तथ्यों पर आपत्ति थी, तो वह स्पष्टीकरण या खंडन जारी कर सकती थी, लेकिन सीधे जेल भेजने की धमकी देना पुलिस राज्य (Police State) की मानसिकता को दर्शाता है।
संपादकीय टिप्पणी: 7 साल के पत्रकारिता के अनुभव और जमीनी हकीकत को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जब सरकारें सवालों को अपराध मानने लगती हैं, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। मनिंदर सिद्धू के बहाने पूरी पत्रकार बिरादरी को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि ‘सवाल मत पूछो’। लेकिन चंडीगढ़ में उमड़ा यह जनसैलाब बता रहा है कि कलम की स्याही अभी सूखी नहीं है।

