चंडीगढ़: भारत ने एक बार फिर क्रिकेट की दुनिया में अपनी बादशाहत कायम करते हुए तीसरी बार टी-20 विश्व कप का खिताब अपने नाम कर लिया है। जैसे ही फाइनल मुकाबले में भारत ने न्यूजीलैंड को 96 रनों के विशाल अंतर से शिकस्त दी, पूरे देश में मानो भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। चंडीगढ़ सहित पूरे भारतवर्ष में दिवाली जैसा माहौल नजर आया। जीत की खबर मिलते ही चंडीगढ़ के क्रिकेट दीवाने अपने घरों से बाहर निकल पड़े। हाथों में तिरंगा थामे, आंखों में गर्व के आंसू और जुबां पर ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ लोग सड़कों पर अपनी खुशी का इजहार करने लगे।
सेक्टर 22 में आधी रात को उतरा समंदर
शहर का हृदय स्थल कहे जाने वाले सेक्टर 22 के अरोमा पेट्रोल पंप के पास देखते ही देखते हजारों लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी तिरंगा लहराते हुए गाड़ियों में सवार होकर ‘वंदे मातरम’ के जयकारे लगा रहे थे। जश्न का आलम यह था कि लोग ढोल-नगाड़ों की थाप पर भंगड़ा पा रहे थे और आसमान आतिशबाजी से नहा उठा था। जीत की इस खुशी में लोग होली के रंगों को हवा में उड़ाकर एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे। देर रात तक चलने वाले इस उत्सव ने शहर की रफ्तार को थाम दिया।
सुरक्षा के घेरे में उल्लास और पुलिस की मुस्तैदी
भारी भीड़ और बढ़ते उत्साह के बीच चंडीगढ़ पुलिस विभाग ने यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए अपनी कमर कस ली थी। पुलिसकर्मी बखूबी अपनी ड्यूटी निभा रहे थे ताकि ट्रैफिक बाधित न हो। हालांकि, जब उत्साही भीड़ ने सड़कों को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया, तो पुलिस को बीच-बीच में थोड़ी सख्ती भी बरतनी पड़ी। जश्न इतना जबरदस्त था कि देर रात तक सड़कों पर पैर रखने की जगह नहीं बची थी और पूरा शहर जीत के इस उन्माद में डूबा रहा।
जश्न के शोर में दबी एक कड़वी हकीकत
जहाँ आज अरोमा पंप पर क्रिकेट प्रेमियों का सैलाब उमड़ा हुआ है, वहीं नवंबर 2025 की एक धुंधली याद भी जेहन में उभरती है। जब इसी देश की महिला क्रिकेट टीम ने टी-20 वर्ल्ड कप जीता था, तब इसी अरोमा पंप पर सन्नाटा पसरा हुआ था। उस ऐतिहासिक जीत पर केवल दो-तीन लोग ही हाथों में बैनर लेकर पहुंचे थे। आज की इस भीड़ और उस दिन के सन्नाटे के बीच का अंतर कई सवाल खड़े करता है। क्रिकेट के प्रति हमारी यह दीवानगी क्या केवल जेंडर (लिंग) के आधार पर बंटी हुई है?
संपादकीय टिप्पणी: तीसरी बार विश्व विजेता बनना भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम युग की गवाही देता है, लेकिन इस जश्न के बीच एक सामाजिक विरोधाभास भी खुलकर सामने आया है। पुरुष टीम की जीत पर उमड़ने वाला यह सैलाब और महिला टीम की जीत पर पसरा सन्नाटा हमारी खेल मानसिकता के दोहरेपन को उजागर करता है। जब खेल और देश का गौरव एक ही है, तो उत्सव के पैमाने अलग क्यों? एक सभ्य और विकसित राष्ट्र के रूप में हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हमारी खेल भावना वास्तव में ‘भारतीय टीम’ के लिए है या केवल ‘पुरुष टीम’ के लिए। तिरंगे की शान जितनी पुरुष टीम ने बढ़ाई, उतनी ही महिला टीम ने भी; फिर उनके स्वागत में यह बेरुखी क्यों?
