चंडीगढ़: नगर निगम चंडीगढ़ की कार्यप्रणाली एक बार फिर गहरे संदेह के घेरे में आ गई है, जहां सेक्टर 17 में लगातार अपनी फीस भरने वाले एसेंशियल सर्विस के वैध वेंडर नगर निगम की बेरुखी और कथित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं। ये वेंडर अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, जिन्हें बिना किसी ठोस न्याय के 9 से 10 किलोमीटर दूर भेज दिया गया है, मानो उन्हें भूखा मरने के लिए छोड़ दिया गया हो। वेंडरों का साफ कहना है कि वे व्यापारियों के हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, लेकिन नगर निगम के अधिकारी सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की रट लगा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अवैध वेंडरों को हटाने के लिए थे, न कि उन वैध वेंडरों को उजाड़ने के लिए जो पूरी ईमानदारी से अपने कारोबार का संचालन कर रहे थे।
भ्रष्टाचार की बू और कोरोना काल का बहाना
नगर निगम की ओर से यह स्पष्टीकरण दिया जा रहा है कि ये वेंडर कोरोना काल के वक्त बैठाए गए थे, लेकिन इस दलील के पीछे एक गहरी साजिश और भ्रष्टाचार की बू साफ महसूस की जा रही है। कोरोना काल का यह बहाना पूरी तरह बेबुनियाद साबित होता है क्योंकि 17 जुलाई 2020 की टाउन वेंडिंग कमेटी (TVC) की मीटिंग में इसका कोई भी जिक्र मौजूद नहीं है। उस मुश्किल समय में तो केवल लोगों को जरूरी सामान मुहैया कराने के लिए पास बनाकर दिए गए थे, ताकि आम जनता को राहत मिल सके। अब इसी को आधार बनाकर वैध वेंडरों के खिलाफ कार्रवाई करना अधिकारियों की मंशा पर बड़े सवाल खड़े करता है।
ग्राउंड जीरो का सच और सीबीआई जांच का साया
जब हमारे पत्रकार ने सेक्टर 17 का जमीनी निरीक्षण किया, तो वहां नगर निगम के दावों की पोल खुल गई और असलियत सामने आ गई। मौके पर डीसी ऑफिस के पीछे टाइपिस्ट के सामने चाय के स्टॉल, रोटी के स्टॉल और अन्य कई तरह के स्टॉल धड़ल्ले से लगे हुए पाए गए। यह सब किसी उच्च अधिकारी का कोई गुप्त खेल है या फिर पैसों का अवैध लेनदेन? पैसों और भ्रष्टाचार का यह खेल नया नहीं है, क्योंकि नगर निगम के 9 अधिकारियों के खिलाफ पहले से ही सीबीआई जांच चल रही है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प और लाजिमी होगा कि क्या नगर निगम इन भ्रष्ट अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में ही दफन होकर रह जाएगा।
संपादकीय टिप्पणी: चंडीगढ़ नगर निगम द्वारा वैध वेंडरों के प्रति अपनाई जा रही यह पक्षपातपूर्ण और संदेहास्पद नीति शहर के प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता पर एक काला धब्बा है। जब वेंडर नियमित रूप से अपनी फीस भर रहे हैं और कोरोना काल के संकट के समय प्रशासन की मदद कर चुके हैं, तो उन्हें अचानक 9-10 किलोमीटर दूर उजाड़ देना किसी अन्याय से कम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आड़ लेकर गरीब और मेहनतकश वेंडरों का उत्पीड़न करना और दूसरी तरफ सेक्टर 17 में चुनिंदा स्टॉलों को हरी झंडी देना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। सीबीआई जांच के घेरे में पहले से चल रहे नगर निगम के अधिकारियों के कार्यकाल में इस तरह की मनमानी प्रशासनिक अराजकता को दर्शाती है। यदि समय रहते इस मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक तानाशाही शहर के छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ कर रख देगी।
