चंडीगढ़: “एक पेड़ मां के नाम” – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया यह नारा आज जमीनी हकीकत में तब्दील हो रहा है या सिर्फ किताबों के पन्नों तक सिमट कर रह गया है, यह एक बड़ा सवाल बन चुका है। चंडीगढ़ में हॉर्टिकल्चर विभाग की कथित नाकामियों के कारण सदियों पुराने पेड़ों का वजूद धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। शहर की खूबसूरती और पर्यावरण को संजोने वाले ये पेड़ आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर हैं, लेकिन प्रशासन का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है।
विरासत पिलखन के पेड़ की दर्दभरी आपबीती
चंडीगढ़ की हेरिटेज केटेगरी में शामिल और करीब 100 से 150 साल पुराना पिलखन का पेड़ अपनी बेबसी बयां कर रहा है। दशकों से लोगों को ठंडी छाया और शुद्ध हवा देने वाला यह विरासत पेड़ आज अपनी कमजोर होती जड़ों के कारण दर्द में है। पुराना होने की वजह से इसकी जड़ें अब ढीली पड़ रही हैं, लेकिन यह पेड़ अपना दुख किसी से बयां नहीं कर पा रहा है।
साथी के गिरने का खौफ और खोखली होती जड़ें
पेड़ की जड़ों से वह मिट्टी धीरे-धीरे खत्म और खोखली होती जा रही है जो इसे मजबूती प्रदान करती थी। महज दस दिन पहले इसी तरह की कमजोर जड़ों के कारण इसका एक साथी पेड़ अचानक उखड़ कर गिर गया। पुरानी कहावत है कि बेटा पालना और पेड़ पालना एक समान होता है, परंतु हॉर्टिकल्चर विभाग की अनदेखी के चलते इन अमूल्य धरोहरों का वजूद मिटने लगा है।
हादसों का इंतजार और प्रशासन से गुहार
शहर में न जाने ऐसे और कितने पुराने पेड़ होंगे जो देखरेख के अभाव में उखड़ने और हादसों का कारण बनने का इंतजार कर रहे हैं। प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की इस बेरुखी के बीच सवाल उठता है कि क्या समय रहते इन विरासत पेड़ों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा? अगर जल्द ही इनकी जड़ों को मजबूती देने और रखरखाव का काम शुरू नहीं किया गया तो शहर अपनी एक बड़ी हरी-भरी पहचान खो देगा।
संपादकीय टिप्पणी: चंडीगढ़ को ‘द सिटी ब्यूटीफुल’ बनाने में यहां के सदियों पुराने विरासत पेड़ों का बहुत बड़ा योगदान है। “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियानों की सार्थकता नए पौधे लगाने के साथ-साथ इन पुराने और विशाल पेड़ों का संरक्षण करने में ही निहित है। हॉर्टिकल्चर विभाग को केवल कागजी योजनाओं तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर इन धरोहर पेड़ों की जड़ों की स्थिति की जांच करनी चाहिए। यदि समय रहते इनकी देखभाल और मिट्टी की मजबूती का ध्यान नहीं रखा गया, तो यह न केवल पर्यावरण का नुकसान होगा बल्कि किसी बड़े हादसे को भी न्योता देगा।
