चंडीगढ़ : चंडीगढ़ के सेक्टर 37सी में तेल पंप के पास स्थित मार्केट के ठीक बाहर खड़ा एक विशाल और प्राचीन पीपल का पेड़ आज नगर निगम और हॉर्टिकल्चर विभाग की घोर लापरवाही के कारण अपने आंसू बहा रहा है। हिंदू धर्म में जिस पीपल के वृक्ष को अत्यंत पूजनीय मानकर पूजा जाता है, आज वही पेड़ सरकारी तंत्र की अनदेखी के चलते धीरे-धीरे मौत के कगार पर पहुंच गया है। इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले वृक्ष की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है। न तो विभाग द्वारा कभी इसे पानी दिया जा रहा है और न ही इसकी कोई बुनियादी देखभाल की जा रही है, जिससे इस पूरे व्यस्त व्यापारिक क्षेत्र में एक बड़े हादसे की जमीन तैयार हो रही है।
कुर्सी की सियासत और खोखली होती जड़ें
पहले के समय में लोग पीपल की चौपाल पर बैठकर आपस में बातें किया करते थे और तपती गर्मियों में इसकी घनी छाँव के नीचे घंटों बैठकर सुस्ताते थे। लेकिन आज इस पूजनीय वृक्ष की स्थिति बदतर हो चुकी है। चूहों ने इस विशाल पेड़ की जड़ों को अंदर ही अंदर खोदकर पूरी तरह खोखला कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल मार्केट के प्रधान पर भी खड़ा होता है कि क्या कभी उनकी नज़र इस गंभीर समस्या की ओर नहीं गई, या फिर उनकी प्रधानगी सिर्फ दफ्तर की कुर्सियों तक ही सीमित रह गई है?
सरकारी टैंकरों का सूखा और दुकानदारों का दर्द
जब इस संबंध में स्थानीय दुकानदारों से ग्राउंड जीरो पर बातचीत की गई, तो उन्होंने प्रशासन की पोल खोलकर रख दी। दुकानदारों ने बताया कि पहले के समय में हॉर्टिकल्चर विभाग की टीम नियमित रूप से यहां आती थी और पेड़-पौधों को पानी दिया करती थी। लेकिन अब स्थिति यह है कि विभाग की पानी वाली गाड़ी देखे हुए एक पूरा जमाना बीत चुका है। अधिकारियों की इस बेरुखी ने एक हरे-भरे पूजनीय वृक्ष को सूखे की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
बरसात का मौसम और मंडराता हुआ खतरा
अब जबकि बरसात का मौसम बिल्कुल आने वाला है, ऐसे में तेज आंधी और तूफान आने पर यह खोखला हो चुका पीपल का पेड़ किसी भी वक्त भरभराकर गिर सकता है। चूंकि यह मार्केट के बाहर का बेहद व्यस्त इलाका है, इसलिए पेड़ गिरने से किसी भी समय भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि हॉर्टिकल्चर विभाग की नींद अब भी नहीं खुली और कोई बड़ा हादसा हो गया, तो मासूम लोगों की जान के नुकसान का जिम्मेदार आखिर कौन होगा?
संपादकीय टिप्पणी: सेक्टर 37सी में पूजनीय पीपल के पेड़ की यह दुर्दशा हमारे प्रशासनिक विभागों की संवेदनहीनता को उजागर करती है। जो पेड़ कभी समाज के लिए आस्था और छाँव का केंद्र हुआ करते थे, वे आज सरकारी उपेक्षा के कारण खुद अपने अस्तित्व की भीख मांग रहे हैं। चूहों द्वारा जड़ें खोखली करना और विभाग द्वारा पानी तक न देना यह साबित करता है कि हॉर्टिकल्चर विभाग केवल कागजों पर काम कर रहा है। आगामी मानसून और आंधी-तूफान के मद्देनजर यह लापरवाही किसी बड़े हादसे को न्यौता दे रही है। नगर निगम को चाहिए कि वह हादसों का इंतजार करने की इस सुस्त कार्यप्रणाली को छोड़े, तुरंत इस पेड़ का तकनीकी मूल्यांकन करवाए और इसकी जड़ों को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से जान-माल की रक्षा की जा सके।
