चंडीगढ़: दिवाली के अगले दिन, चंडीगढ़ में विश्वकर्मा पूजा और गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व देखा गया। इन दोनों पर्वों को शहर में बड़े उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाया गया, जो भारतीय संस्कृति और लोकजीवन का अभिन्न अंग हैं।
विश्वकर्मा पूजा का महत्व: दिवाली की शाम को, कामगार और फैक्ट्रियों में कार्यरत लोग अपने औजारों की साफ-सफाई कर उन्हें करीने से रखते हैं। अगले दिन सुबह, भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है, जिन्हें सृष्टि का दिव्य वास्तुकार और इंजीनियर माना जाता है। इस पूजा के बाद ही लोग अपने-अपने कार्य शुरू करते हैं, जो काम के प्रति सम्मान और कुशलता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
गोवर्धन पूजा: प्रकृति और गोधन का सम्मान: गोवर्धन पूजा का लोकजीवन में अत्यंत महत्व है, क्योंकि यह पर्व प्रकृति और मानव के सीधे संबंध को दर्शाता है। इस पूजा में गोधन, यानी गायों की पूजा की जाती है। गायों को उतना ही पवित्र माना जाता है, जितना कि नदियों को। उन्हें देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है, जो समृद्धि और कल्याण लाती हैं।
धनास के ग्वाला समुदाय की अनूठी परंपरा: सेक्टर 14 वेस्ट, धनास, चंडीगढ़ में रहने वाले ग्वाला समुदाय के गोपाल सुनील और जतिन से बातचीत करने पर उन्होंने इस पर्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि धनास में उनके समाज के 14-15 परिवार रहते हैं। गोवर्धन पूजन के दिन उनका समाज गोबर से पर्वत बनाकर उसे फूलों से सजाता है और उसे प्रसाद के रूप में बांटता है।
जतिन ने भगवान कृष्ण और इंद्रदेव से जुड़ी गोवर्धन पर्वत की कथा भी साझा की। उन्होंने बताया कि जब बृजवासियों ने इंद्रदेव की पूजा न करके भगवान श्रीकृष्ण की पूजा शुरू की, तो क्रोधित इंद्र ने मूसलाधार बारिश से बृज को डुबोने का प्रयास किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर सात दिनों तक बृजवासियों को उसके नीचे शरण दी। इससे इंद्रदेव का अहंकार टूट गया और उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इस समुदाय के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा और प्रकृति का सम्मान करने का संदेश दिया।
जतिन ने यह भी बताया कि उनके दादा-परदादा इस रीति-रिवाज को निभाते आ रहे हैं। पूरे चंडीगढ़ में उनके समाज के लगभग 40-50 ग्वाला समुदाय के परिवार रहते हैं, जो दूध डेयरी का काम करते हैं। इन परिवारों की एक विशेष परंपरा यह भी है कि दिवाली की शाम का सारा दूध और गोवर्धन पूजा के दिन का सारा दूध वे “फ्री लंगर प्रसाद” के रूप में बांटते हैं। सुबह से ही उनके घरों के बाहर दूध लेने के लिए लंबी कतारें देखी गईं, जो इस समुदाय की सेवा भावना और परंपरा के प्रति आस्था को दर्शाता है। यह पर्व चंडीगढ़ में धार्मिक श्रद्धा, सामुदायिक भावना और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक बन गया है।
